Abstract:
समाज की सबसे छोटी इकाई मनुष्य है। उसके समान क्षमताएं अन्य किसी भी प्राणी में नहीं हैं। फिर भी उसका जीवन निरंतर परिवर्तन, संघर्ष एवं निर्णयों की प्रक्रिया से गुजरता हुआ एक जटिल यात्रा-पथ है। उसके किसी भी अंग के क्षतिग्रस्त होने से उससे संबंधित गतिविधियों में समस्या उत्पन्न हो जाती है, जिस कारण मानव में अक्षमता की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। इस अक्षमता की स्थिति को दिव्यांगता भी कहा जाता है। सामाजिक परिप्रेक्ष्य में कहा जाए तो मनुष्य में शारीरिक अथवा मानसिक सीमितता आ जाती है। दिव्यांगता के कारण मनुष्य व्यक्तिगत और सामाजिक कार्यों को करने में असमर्थ हो जाता है। दिव्यांगता व्यक्ति की भौतिक, शारीरिक और मानसिक स्थितियों के साथ-साथ उससे उत्पन्न संबंधित गतिविधियों की अवरुद्धता है। इसका आकलन दिव्यांगता वाले व्यक्ति की मनोसामाजिक परिस्थितियों पर निर्भर करता है। दिव्यांगता भौगोलिक और सामाजिक स्थिति से संबंधित होती है। प्रत्येक युग में दिव्यांगजनों के समक्ष सामाजिक, आर्थिक, शेकशील और राजनीतिक चुनौतियाँ विद्यमान रही हैं। परिवार और सामाज के सदस्यों द्वारा दिव्यांगजनों के साथ भेदभाव तथा पूर्वाग्रह का व्यवहार होता रहा है। परंतु वर्तमान समय में ये चुनौतियाँ अधिक जटिल और बहुआयामी रूप में सामने आई हैं। भौतिक प्रगति, वैज्ञानिक उपलब्धियाँ तथा तकनीकी विकास ने जीवन को सुविधाजनक अवश्य बनाया है। किंतु इसके साथ-साथ दिव्यांगजनों के जीवन में मानसिक तनाव, आत्मविश्वास की कमी, असंतोष और आत्मिक शून्यता की समस्याएँ भी तीव्र हुई हैं। ऐसी परिस्थितियों में यह आवश्यक हो जाता है कि दिव्यांगजनों को दिशा देने वाली नवाचार वाली समाजशास्त्रीय योजनाओं तथा नीतियों की रणनीति बनाने पर कार्य किया जाए ताकि उनके जीवन की चुनौतियों को काम किया जा सके। प्रस्तुत शोधपत्र का उद्देश्य जिला नीमच के परिप्रेक्ष्य में दिव्यांगजनों की चुनौतियों का समाजशास्त्रीय अध्ययन करना है।